गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

विचारों का आतंक



नया-नया आतंक 


संभवतः की सीमाओं के आर पार 
बोध की घडीनुमा इन्द्री, वो भी जिह्वा का तेवर लिए 

चंद मिनटों में आकाशगंगा को लांघने जैसा 
वो भी उर्जा को विसर्जित किये बिना ही 

रेखाओं के बराबर और उसके समूह जैसा भी 
कभी काट देना और उस पर सवार होना भी 
समेट देना एक सूक्ष्तम पर
और विराट इतना कि समय की तय सीमा सिमट जाये पुनः एक बिंदु पर

वैसा ही जैसे बिना जाने कुछ पाकिस्तान को कोसने लगना
वैसा ही कुछ लोग हिंदुस्तान के साथ करते हैं
बिना वजह कुछ किताबों के पन्ने पलटने की क्रिया
और को-रिलेट कर लेना उसे अफलातून से

इतिहास लिखने की इच्छा जाहिर करना
फिर सामाजिक ढांचे की आर्थिक गणना करना

मोहनजोदड़ो के समकक्ष अपनी गर्लफ्रेंड को खड़ा कर देना
फिर कांपते हुए उसे छिपा लेना किसी टीवी में

सच जो बिना बात शुरू होकर
तमाम शर्तों और तथ्यों को नकार देती है
चेहरों पर दर्प, शिकन बिखेरती
पहचान को धूमिल करती
नयेपन को ओढ़े हुई बेहद पुरानी
जो पहुँच जाती है ख़ुदकुशी के दहलीज़ तक या उससे परे भी
जिसे हम आत्महत्या कहते हैं या आत्महत्या की कोशिश
जिसका कारण महज कुछ कल्पनाएं भर होती है
और अक्सर इसे हम अख़बार में पढ़ते हैं/देखते हैं

दरअसल ये नया नया आतंक है
जिसकी शिकार पूरी मानव प्रजाति हो रही है (जानवर इसके शिकार नहीं)
जो सूचीबद्ध हुआ है हाल ही के कुछ सालों में
पर इसके इतिहास का आदि हम नहीं जानते

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ये विचारों का आतंक है

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