बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

देह नोचने के काबिल का नाम मोहब्बत

दुनियावी सर्च इंजिन में तलाशते उस काबिलियत को   
जो देह को ठीक-ठाक तरीके से नोंच सके 

वर्चुअल दुनिया के ब्रह्माण्ड में तैरते हैं रात को बिना सोये 
भात-रोटी नहीं, साइबर वायर खाते हैं 24*7

ये परंपरा की कोई सीढ़ी नहीं, ये सौ साल टिकने वाले भी नहीं 
पर दुनिया तो है इनके जैसों का ही 

सवाल मत उठाना कोई, न इनपर-न इनसे 
ये शबरी से तेज हैं, मीठा छांट लेते हैं चखने से पहले 

ये मोहब्बतों के नए चश्मे,  इश्क़ दिखता नहीं इनके बिना।

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

सपने फिर चटक जाते हैं

विचारों की खोई हुई लड़ियाँ गुंजाती है अवचेतन को। कुछ कड़ियाँ कोशिश करतीं हैं हमारे साथ होने के अनुनाद को एहसास में बदलने की।

मैं अक्सर एक नदी की कल्पना करता हूँ 
जिसके किनारे हम टहलते हैं गलबहियां डाले 

बहूत दूर तक जाने की उम्मीद में 
भूल जाते हैं पांवों को समझना 

एक दूसरे को काटते और मांझते हुए 
बदल जाते हैं पत्थर की आकृतियों में 
इतना कि फिर उड़ नहीं पाते
इतना कि फिर लुढ़कने भर की कोशिश करते हैं तेज धार में भी

सपने फिर चटक जाते हैं
क्या फर्क पड़ता है कि - मैं उसे दिन में देखता हूँ या रात में।

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

झूठ के दिनों की याद

झूठ के दिनों की याद आज भी ताजे खून जैसा है 
धमनियों में पहले कदम का एहसास लिए 

लोग तब भी ख़ारिज करते थे, अब भी करते हैं 
मैं बेबस हूँ, पहले की ही तरह 
***
मोहब्बत, झूठ का पुलिंदा भर नहीं 
विश्वाश नहीं तो एहसास से फिर पूछो 

ये सच है कि आशिक झूठ बोलते हैं मेरी तरह 
और तमाम प्रेमिकाएं आतुर रहतीं हैं सुनने के लिए
बिल्कुल तुम्हारी ही तरह 
पर ये कोई तोहमत नहीं 
इससे झूठा साबित नहीं हो जाता, दुनिया का कोई भी प्रेम 
***

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

विचारों का आतंक



नया-नया आतंक 


संभवतः की सीमाओं के आर पार 
बोध की घडीनुमा इन्द्री, वो भी जिह्वा का तेवर लिए 

चंद मिनटों में आकाशगंगा को लांघने जैसा 
वो भी उर्जा को विसर्जित किये बिना ही 

रेखाओं के बराबर और उसके समूह जैसा भी 
कभी काट देना और उस पर सवार होना भी 
समेट देना एक सूक्ष्तम पर
और विराट इतना कि समय की तय सीमा सिमट जाये पुनः एक बिंदु पर

वैसा ही जैसे बिना जाने कुछ पाकिस्तान को कोसने लगना
वैसा ही कुछ लोग हिंदुस्तान के साथ करते हैं
बिना वजह कुछ किताबों के पन्ने पलटने की क्रिया
और को-रिलेट कर लेना उसे अफलातून से

इतिहास लिखने की इच्छा जाहिर करना
फिर सामाजिक ढांचे की आर्थिक गणना करना

मोहनजोदड़ो के समकक्ष अपनी गर्लफ्रेंड को खड़ा कर देना
फिर कांपते हुए उसे छिपा लेना किसी टीवी में

सच जो बिना बात शुरू होकर
तमाम शर्तों और तथ्यों को नकार देती है
चेहरों पर दर्प, शिकन बिखेरती
पहचान को धूमिल करती
नयेपन को ओढ़े हुई बेहद पुरानी
जो पहुँच जाती है ख़ुदकुशी के दहलीज़ तक या उससे परे भी
जिसे हम आत्महत्या कहते हैं या आत्महत्या की कोशिश
जिसका कारण महज कुछ कल्पनाएं भर होती है
और अक्सर इसे हम अख़बार में पढ़ते हैं/देखते हैं

दरअसल ये नया नया आतंक है
जिसकी शिकार पूरी मानव प्रजाति हो रही है (जानवर इसके शिकार नहीं)
जो सूचीबद्ध हुआ है हाल ही के कुछ सालों में
पर इसके इतिहास का आदि हम नहीं जानते

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ये विचारों का आतंक है