सोमवार, 28 जनवरी 2013

कविता और कहानी: अवचेतन का पीकदान

कविता और कहानी: अवचेतन का पीकदान: मंगलवार को बड़े दिनों बाद मैं सड़क पर था। ढेरों अनजान चेहरे आसपास थे। मैं उन्हें अतीत के पन्नों में टटोल रहा था। एक चेहरा जाना पहचाना सा ...

अवचेतन का पीकदान



मंगलवार को बड़े दिनों बाद मैं सड़क पर था। ढेरों अनजान चेहरे आसपास थे। मैं उन्हें अतीत के पन्नों में टटोल रहा था। एक चेहरा जाना पहचाना सा लगा। मैं अनुमान लगाया की हो न हो ये तो बिजय बहादुर हैं।
पास गया तो बिजय बहादुर को पान खाते देखा। उन्होंने मुझे देखते ही कहा कि आज वे अपने साथ पीकदान रखना भूल गए हैं। मैंने अपनी दोनों हथेली को पीकदान जैसा बना लिया। फिर साथ में कदमताल करने लगे। हर चार-पांच कदम पर बिजय बहादुर मेरी हथेलियों में थूक देते। और मैं आभार व्यक्त करने वाली आँख से चुपके से उन्हें देख लेता।
वो मुझे अपना संस्मरण सुना रहे थे। पहली कहानी जो उन्होंने बताई, उसकी पहली लाइन थी- बचपन में वे बहुत होनहार थे। नवोदय में पढ़ते थे। टीचर उनका लोहा मानते थे। कहते थे- ' इस लड़के को तो नौकरी यूँ ही मिल जाएगी।' बात को उन्होंने अटल सत्य माना और नौकरी ढूँढने में जब तक तेल नहीं निकल गया, इसे ढोते रहे।
दरअसल वे जब पढ़ रहे थे तब सिर्फ आठ-दस नौकरियों के बारे में जानते थे। कलेक्टर, डॉक्टर, इंजीनियर, ड्राईवर और टीचर इत्यादि टाइप। इस मामले पर उनका पूरा ज्ञान अनुमान पर ही आधारित था। क्योंकि इसके बारे में उन्हें किसी ने नहीं बताया था। वे भी किसी से पूछ नहीं पाए थे। कुछ अनजान वजहें थीं, उनसे उत्प्रेरित होकर। उस अनजान वजह के बारे में अपने अनुमान के बारे में भी बताया। उनके निष्कर्ष के अनुसार वे कभी समझ ही नहीं पाए कि क्यों बच्चे अपने करियर के बारे में किसी से पूछ नहीं पाते।
फिर उन्हें लगा कि बात लम्बी खिंच रही है। उन्होंने कहा- तुम्हें संक्षेप में बताता हूँ। सोचने समझने के लिहाज से स्कूल बचपने में बीता। होम वर्क करने और खेलने में ही पूरा दिन निकल जाता था। कॉलेज का पूरा वक़्त महिलाओं के न समझ में आने वाले चरित्र की परिभाषाओं को गढ़ने में निकल गया। और पीजी डेढ़ होशियार होने के भ्रम में। सीना तान के ऑफर लेटर लेने प्लेस मेंट एजेंसी पहुंचे। वहां जितनी नौकरियों के लिए अप्रॉच करने कहा गया, उस लिस्ट में कलेक्टर, डॉक्टर इत्यादि थे ही नहीं। पहले तो लगा की वो पागलखाने में आ गए हैं। फिर सुन्दर लड़की को देखकर थोडा इत्मिनान हुआ। बायोडाटा फिर से चेक करने के बाद जब उस लड़की ने कहा कि आप तो आर्ट्स ग्रेजुएट हो। पीजी में भी वही है। 12वीं में भी वही। अरे ये तो बहुत गड़बड़ मामला है। आपको अब पैसा खर्च करना पड़ेगा। वे सन्न थे और सोच रहे थे कि शिक्षक लोग वाकई बेवकूफ होते हैं। उन्होंने जितनी चीजें पढाई सब गलत। काम की एक भी चीज के बारे में कभी बताया ही नहीं।
खैर वे वहां से निकल आये। सोचने लगे अब क्या किया जाए। पहली बुद्धि ने सजेस्ट किया कि फिर से पढाई कर लेते हैं। साइंस लेकर 12वीं करते हैं। फिर इंजीनियरिंग या डॉकटरी। उसके बाद एमबीए कर लेंगे। नौकरी वाला सब क्राइटेरिया ओके हो जायेगा।
इस विचार से आगे बढे तो गर्लफ्रेंड की याद आई। (उस वक़्त सोचते थे कि यही मोहतरमा उनकी पत्नी होगी।) लगा की पत्नी तो बहुत हँसेगी। कहेगी सारे हमउम्र नौकरी कर रहे हैं और वे ... . . . । और अगर बच्चे हो गए तो . . . ? किसी ने अगर उनसे पूछ लिया कि पापा क्या करते हैं तो . . . ?
उन्न्न्हूउ . . आईडिया कैंसिल।
(फिर वे लेखक बन गए। बाद में कुछ सेटिंग हुई तो इनके नाम के आगे प्रोफ़ेसर शब्द जुड़ गया।)
अचानक फिर बिजय बहादुर को लगा कि फिर लम्बा खिंच रहा है। उन्होंने कहा- छोडो यार इस बात को। मैं तुम्हें दूसरा संस्मरण सुनाता हूँ। फिर उन्होंने मेरी हथेली में थूक दिया। मेरी कातर निगाहें एक बार फिर उन पर टिक गईं।
विषय था- कैसे वे नामी प्रोफ़ेसर हो गए।
जब उन्होंने कहना शुरू किया तब मेरा छोटा दिमाग उनके स्टेटस की चीड़फाड़ कर रहा था। वे अपनी लेखनी से कहीं ज्यादा अपने चरित्र की वजह से जाने जाते थे। ढेरों किवदंतियां प्रचलित थीं। कुछ तो इसी पर सवाल उठाते थे कि उन्होंने अपने जीवन में 13 लोगों को पी एच डी के लिए मार्गदर्शन दिया। सभी कन्याएं। क्या कोई पुरुष नहीं मिला उन्हें। कुछ लोग कहते थे उनकी बेटियां उनके साथ नहीं रहना चाहतीं क्योंकि उन्हें डर लगता है। फिर जब कॉलेज में पढ़ाने जाते थे तो सिर्फ लड़कियों से बात करते थे। और भी न जाने कितनी। हाँ एक सच मुझे पता था की उनकी एक से ज्यादा शादी हुई थी पर वे रहते अकेले थे।
अचानक उन्होंने मुझे टोका- लगता है तुम मेरी बात सुन नहीं रहे। मैं किसी भी हाल में उनको नाराज नहीं करना चाहता था। मैंने अपनी छोटे दिमाग को चीडफाड़ बंद करने के लिए कहा।
उन्होंने आगे कहना शुरू किया- स्कूल के शुरुआती दिनों में उनकी सही पहचान करने में अनेक लोग नाकाम रहे थे। उन अनेक लोगों में ढेर सारे टीचर थे। टीचर बहूत टैलेंटेड नहीं मानते थे। म्यूजिक तो बहुत बुरा था। उस पर दुःख ये कि सजा के रूप में उस मुस्लमान लड़की के सामने गाना पड़ता था जिसे वे लाइन मारते थे। सारा कॉन्फिडेंस गिर जाता था। बहुत कोफ़्त होती थी अपने ऊपर। लगता था गलत घर में पैदा हो गए या गलत स्कूल में पढना पड़ रहा। फिर एक बार म्यूजिक टीचर की बीवी को नहाते हुए उन्होंने देख लिया था। ऐसा करते हुए म्यूजिक टीचर ने देख लिया था। तब से बात ज्यादा बिगड़ गई थी।
हाँ कुछ और बातें भी थी। मसलन पूरे स्कूल में सिर्फ वे ही नशा करते थे, ट्यूबलाइट फोड़ते थे। अक्सर गर्ल्स हॉस्टल में घुस जाते थे। पैंटी और ब्रा जैसी चीजें उठा लाते थे। ये सारी चीजें उन्हें औरों से अलग करती थी। वे सुनते थे की प्रिंसिपल की बेटी उन्हें बहुत पसंद करती थी। लेकिन प्रिंसिपल सहित सभी टीचर इस हुनर को इसलिए दरकिनार कर देते थे क्योंकि उनकी कुंठा उनके गिरेबान से बाहर आ जाती थी। उनके अनुसार इससे भारत देश की संस्कृति पर दाग लगता था।
मैंने न चाहते हुए भी उन्हें टोका- कि प्रोफ़ेसर बन्ने का इससे क्या ताल्लुक?
थूकते और फिर मुह पोंछते हुए उन्होंने बताया कि- प्रोफ़ेसर बन्ने कि नीव तो स्कूल में डली। जिसे पढ़ते तक नहीं समझ पाया। दरअसल उसी वक्त सोच लिया था कि पुरुष बहुत बेकार होते हैं। उनकी तुलना में महिलाएं बेहतर। लड़कियां सर्वश्रेष्ठ होतीं हैं। इसलिए फोकस में हमेशा लड़कियों को रखना चाहिए । इसी निष्कर्ष ने उन्हें पहले लेखक और बाद में प्रोफ़ेसर बना दिया।
इतना सुनने के बाद मैं कुछ और बातें सोचने लगा। मालम सिंह ने मुझे बनाया और मालम सिंह को बिजय बहादुर ने। मैंने सुन रखा था कि बिजय बहादुर विदिशा में बेतवा के किनारे रहते हैं। उन्हें फिजूल की मालिश बिलकुल पसंद नहीं। मुझे लगा ये वो बिजय बहादुर नहीं है।
और फिर जैसे ही बिजय बहादुर ने थूकने के लिए मुह फुलाया, मैंने हाथ हटा लिया था।