मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

सपने फिर चटक जाते हैं

विचारों की खोई हुई लड़ियाँ गुंजाती है अवचेतन को। कुछ कड़ियाँ कोशिश करतीं हैं हमारे साथ होने के अनुनाद को एहसास में बदलने की।

मैं अक्सर एक नदी की कल्पना करता हूँ 
जिसके किनारे हम टहलते हैं गलबहियां डाले 

बहूत दूर तक जाने की उम्मीद में 
भूल जाते हैं पांवों को समझना 

एक दूसरे को काटते और मांझते हुए 
बदल जाते हैं पत्थर की आकृतियों में 
इतना कि फिर उड़ नहीं पाते
इतना कि फिर लुढ़कने भर की कोशिश करते हैं तेज धार में भी

सपने फिर चटक जाते हैं
क्या फर्क पड़ता है कि - मैं उसे दिन में देखता हूँ या रात में।

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