मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

झूठ के दिनों की याद

झूठ के दिनों की याद आज भी ताजे खून जैसा है 
धमनियों में पहले कदम का एहसास लिए 

लोग तब भी ख़ारिज करते थे, अब भी करते हैं 
मैं बेबस हूँ, पहले की ही तरह 
***
मोहब्बत, झूठ का पुलिंदा भर नहीं 
विश्वाश नहीं तो एहसास से फिर पूछो 

ये सच है कि आशिक झूठ बोलते हैं मेरी तरह 
और तमाम प्रेमिकाएं आतुर रहतीं हैं सुनने के लिए
बिल्कुल तुम्हारी ही तरह 
पर ये कोई तोहमत नहीं 
इससे झूठा साबित नहीं हो जाता, दुनिया का कोई भी प्रेम 
***

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